हिंदू धर्म में सभी व्रतों में सबसे सर्वश्रेष्ठ एकादशी व्रत को माना गया है तथा अधिकमास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को पद्मिनी एकादशी कहा जाता है। पद्मिनी एकादशी, भगवान विष्णु के प्रिय महीने ‘पुरुषोत्तम मास’ में मनाई जाती है, इसलिए इसका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व अन्य एकादशियों की तुलना में कई गुना अधिक बढ़ जाता है। वर्ष 2026 में ज्येष्ठ मास होने के कारण, यह पवित्र व्रत 27 मई, दिन-बुधवार को रखा जाएगा तथा पौराणिक ग्रंथों के अनुसार जो भी व्यक्ति इस व्रत को पूर्ण निष्ठा से करता है, उसे जीवन में सभी भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है, साथ ही मृत्यु के पश्चात उन्हें बैकुंठ धाम (विष्णु लोक) में जगह मिलता है। इसलिए पद्मिनी एकादशी को ‘कमला एकादशी’ तथा ‘पुरुषोत्तम एकादशी’ के नाम से जाना जाता है।
दुखों का अंत और ख़ुशियों की बरसात:
पद्मिनी एकादशी के महात्म्य के बारे में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर को बताया था कि इस महीने में किए गए जप, तप, दान और व्रत का फल कभी नष्ट नहीं होता। जो पुण्य- कठिन तपस्या, यज्ञ और सभी तीर्थों के स्नान से भी प्राप्त नहीं होता, वह फल केवल पद्मिनी एकादशी का व्रत सच्चे मन से रखने मात्र मिल जाता है। यह व्रत व्यक्ति के संचित पापों का नाश करता है और चेतना को जागृत करता है। इस तरह पद्मिनी एकादशी का व्रत करने से हमारे जीवन में सुख-समृद्धि और धन-वैभव का आगमन शुरू हो जाता है।
पद्मिनी एकादशी व्रत कथा: राजा कीर्तिवीर्य और रानी पद्मिनी को मिला उत्तराधिकार
पद्मिनी एकादशी की कथा त्रेतायुग से जुड़ी है तथा पद्म पुराण में एक अत्यंत प्रेरणादायक कथा है, जिसका वर्णन पद्म पुराण और स्कंद पुराण में मिलता है।
संतान प्राप्ति की चिंता: त्रेतायुग में कीर्तिवीर्य नाम के एक अत्यंत प्रतापी राजा राज्य करते थे। राजा के पास सब कुछ था— धन-वैभव, सेना और मान-सम्मान; लेकिन उनका कोई संतान नहीं था। संतान न होने के कारण राजा और उनकी रानियाँ सदैव गहरे मानसिक तनाव और दुःख में डूबे रहते थे।
राजा कीर्तिवीर्य की कई रानियाँ थीं, लेकिन उनके राज्य में कोई उत्तराधिकारी नहीं था। इतना सारा वैभव होने के बाद भी राजा का मन अशांत रहता था। इस मानसिक संताप से मुक्ति के लिए राजा ने राजपाठ छोड़कर वन में तपस्या करने का निर्णय लिया। साथ ही उनकी परम पतिव्रता पत्नी, राजा हरिश्चंद्र की पुत्री महारानी पद्मिनी ने भी महलों के सुख को त्यागकर अपने पति के साथ वन जाने का निश्चय किया।
कठिन तपस्या का मार्ग: संतान की कामना के लिए राजा कीर्तिवीर्य ने अपना राजपाठ मंत्रियों को सौंप दिया और अपनी परम पतिव्रता रानी पद्मिनी के साथ गंधमादन पर्वत पर कठिन तपस्या करने चले गए। राजा ने वहां हजारों वर्षों तक घोर तप किया, जिससे उनका शरीर केवल हड्डियों का ढांचा मात्र रह गया। फिर भी, भगवान विष्णु प्रसन्न नहीं हुए।
माता अनसूया की दिव्य सलाह: अपने पति की ऐसी दयनीय स्थिति देखकर रानी पद्मिनी बेहद दुखी हुईं। उन्होंने परम सती माता अनसूया (महर्षि अत्रि की पत्नी) से मार्गदर्शन मांगी। रानी ने कहा, “हे माता! मेरे स्वामी ने संतान के लिए कई वर्षों तक कठिन तप किया, फिर भी भगवान प्रसन्न नहीं हुए। कृपया मुझे कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे हमारी यह मनोकामना पूरी हो।”

माता अनसूया ने अपनी दिव्य दृष्टि से देख और मुस्कुराते हुए कही, “हे सुमुखी! हर बत्तीस महीने के बाद एक अतिरिक्त महीना आता है, जिसे मलमास या अधिकमास कहा जाता हैं। इस महीने के शुक्ल पक्ष में एक अत्यंत चमत्कारी एकादशी आती है, जिसे ‘पद्मिनी एकादशी’ कहा जाता है। यदि तुम इस दिन निराहार रहकर रात्रि जागरण करते हुए भगवान विष्णु की आराधना करोगी, तो तुम्हें अवश्य ही एक पराक्रमी पुत्र की प्राप्ति होगी।”
व्रत का प्रभाव और कार्तवीर्य अर्जुन का जन्म: रानी पद्मिनी ने माता अनसूया के कहे अनुसार अत्यंत कठिन नियमों का पालन करते हुए पद्मिनी एकादशी का व्रत रखी। उन्होंने दिनभर निर्जला उपवास की और रात भर भगवान श्री हरि के भजनों का कीर्तन करते हुए जागरण की।
उनकी इस अगाध श्रद्धा और कठिन व्रत से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए। वे गरुड़ पर सवार होकर प्रकट हुए और उन्होंने रानी पद्मिनी से वरदान मांगने को कहा। रानी ने बड़ी विनम्रता से कही, “हे प्रभु! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मेरी इस तपस्या का सारा फल मेरे पति को दे दीजिए और उनकी इच्छा पूरी कीजिए। “भगवान विष्णु ने राजा से वरदान मांगने को कहा। राजा कीर्तिवीर्य ने वर मांगा, ” है प्रभु! मुझे एक ऐसा पुत्र दीजिए जो तीनों लोकों में श्रेष्ठ हो, सर्वगुण संपन्न हो और जिसे आपके अतिरिक्त ब्रह्मांड में कोई अन्य परास्त न कर सके।”
भगवान ने ‘तथास्तु’ कहा। कुछ समय पश्चात् रानी पद्मिनी के गर्भ से एक परम प्रतापी पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रार्जुन) रखा गया। वह इतना शक्तिशाली था कि उसने आगे चलकर महाबलशाली रावण को भी युद्ध में हराकर बंदी बना लिया था।
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