क्यों है पद्मिनी एकादशी बाकी सभी 24 एकादशियों से अधिक फलदायी?

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आमतौर पर वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं और हर एकादशी का अपना एक विशेष महत्व होता है, लेकिन इन 24 एकादशियों के अलावा एक ऐसी एकादशी है, जिसे ‘महा-एकादशी’ ‘कमला एकादशी’ तथा ‘पुरुषोत्तम एकादशी’ के नाम से जाना जाता है और इन सभी एकादशियों में सबसे अधिक फलदायी माना गया है। वह है—पद्मिनी एकादशी

हिंदू धर्म में एकादशी व्रत को सर्वोपरि माना गया है। हर तीन साल में एक बार ‘अधिकमास’ होने के कारण पद्मिनी एकादशी का व्रत रखा जाता है जो बाकी सभी एकादशियों से अत्यंत प्रभावशाली है? तो आइए इस लेख के माध्यम से हम पद्मिनी एकादशी के पौराणिक महत्व और इसके आध्यात्मिक रहस्यों के बारे में विस्तार से समझते हैं।

1. तीन साल में एक बार आने वाला महापर्व:

आमतौर पर हर महीने में दो एकादशियां (कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष) होती हैं, जिससे एक साल में 24 एकादशियों का व्रत रखा जाता हैं। लेकिन पद्मिनी एकादशी हर साल नहीं आती। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, हर तीन साल में एक बार ‘अधिकमास’ (जिसे मलमल तथा पुरुषोत्तम मास कहा जाता है) आता है। इसी अधिकमास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को ‘पद्मिनी एकादशी‘ कहा जाता है। चूँकि पद्मिनी एकादशी का यह व्रत हर तीन साल में केवल एक बार रखने का अवसर मिलता है, इसलिए सनातन धर्म में इस एकादशी को महापर्व के रूप में मनाया जाता है।

2. साक्षात भगवान विष्णु (पुरुषोत्तम) का आशीर्वाद:

पौराणिक कथाओं के अनुसार, अधिकमास को पहले अपवित्र माना जाता था क्योंकि इस महीने का कोई ग्रह या देवता नहीं था। इस बात से दुखी होकर इस मास ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु ने इस महीने को अपना नाम दिया—‘पुरुषोत्तम मास’। साथ ही भगवान विष्णु ने वरदान दिया कि जो भी व्यक्ति इस महीने में मेरी भक्ति, व्रत या दान करेगा, उसे अन्य एकादशी की तुलना में अधिक पुण्य प्राप्त होगा। चूंकि पद्मिनी एकादशी इसी पुरुषोत्तम मास की मुख्य एकादशी है, इसलिए इस दिन किए गए व्रत और पूजा से साक्षात भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी अत्यंत प्रसन्न होते हैं और भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखते है।

क्यों है पद्मिनी एकादशी बाकी सभी 24 एकादशियों से अधिक फलदायी

3. राजा कार्तवीर्य अर्जुन का उदय:

पद्मिनी एकादशी की कथा पद्म पुराण में विस्तार से जानने को मिलता है। त्रेतायुग में कीर्तवीर्य नाम के एक प्रतापी राजा थे, लेकिन उनका कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए राजा अपनी पत्नी महारानी पद्मिनी के साथ वनों में कठोर तपस्या करने चले गए।

हजारों वर्षों की तपस्या के बाद भी जब फल नहीं मिला, तब माता अनुसूया ने रानी पद्मिनी को अधिकमास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी। रानी पद्मिनी ने पूरे नियमों के साथ इस एकादशी का व्रत की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने रानी से वरदान मांगने को कहा। रानी ने अपने पति के लिए एक ऐसा पुत्र मांगा जो सर्वगुण संपन्न हो और जिसे तीनों लोकों में कोई न हरा सके। इसी व्रत के प्रभाव से रानी पद्मिनी के घर ‘कार्तवीर्य अर्जुन’ (सहस्रार्जुन) का जन्म हुआ, जो इतना शक्तिशाली था कि उसने महाबलशाली रावण को भी बंदी बना लिया था।

4. चौबीस एकादशियों के बराबर फल देने वाला महाव्रत।

पुराणों में यह बताया गया है कि जो फल वर्ष की सभी 24 एकादशियों के कठिन व्रत और नियमों के पालन से मिलता है, वह फल अकेले पुरुषोत्तम मास की पद्मिनी एकादशी का व्रत करने से प्राप्त हो जाता है। यदि कोई व्यक्ति किसी कारणवश 24 एकादशियों का व्रत नहीं कर पाता है, तो वह पद्मिनी एकादशी का व्रत रखकर उन सभी व्रतों की कमी को पूरा कर सकता है।

5. ‘पद्मिनी एकादशी’ के रूप में महालक्ष्मी की असीम कृपा:

अधिकमास के स्वामी स्वयं भगवान विष्णु हैं और विष्णु जी की अर्धांगिनी माता लक्ष्मी हैं, जिन्हें ‘कमला’ भी कहा जाता है। यही कारण है कि इस एकादशी को कमला एकादशी कहते हैं। इस दिन श्रीहरि के साथ-साथ मां लक्ष्मी की ‘कमला’ रूप में विशेष पूजा की जाती है। यदि कोई व्यक्ति आर्थिक तंगी, संतान प्राप्ति तथा अन्य कई परेशानियों से जूझ रहा है, तो इस एकादशी का व्रत करने से उनकी हर एक परेशानी दूर हो जाती है। साथ ही उनके जीवन में सुख-समृद्धि तथा धन-वैभव की प्राप्ति होने लगती है।

6. मोक्ष और बैकुंठ धाम की प्राप्ति:

माना जाता है कि ‘पद्मिनी एकादशी’ के दिन पूरी रात जागकर भगवान विष्णु के कीर्तन और ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करने वाले मनुष्य के लिए वैकुंठ (विष्णु लोक) के द्वार खुल जाते हैं और इस लोक में उत्तम सुख भोगने के बाद मृत्यपरांत उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए पद्मिनी एकादशी को अत्यंत फलदायी तथा महत्वपूर्ण माना गया है।

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