वर्ष भर में अनेक पर्व और त्यौहार आते हैं, परंतु हिन्दू धर्म में कार्तिक पूर्णिमा का स्थान अत्यंत विशेष है। इस दिन को धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र माना जाता है। यह पर्व प्रकाश, ज्ञान, दान और पवित्र स्नान का प्रतीक है।
वाराणसी में कार्तिक पूर्णिमा के दिन को “देव दीपावली” के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन देवता स्वयं धरती पर विराजमान रहते है और अपने भक्तों को आशीर्वाद देते है। इसलिए इस दिन को प्रकाश का प्रतीक माना जाता है. कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों की आराधना का विशेष महत्व होता है।
Kartik Purnima 2025 Kab Hai:
साल 2025 में कार्तिक पूर्णिमा 05 नवंबर दिन बुधवार को मनया जाएगा। इस पावन दिन पर तुलसी पूजा, गंगा स्नान तथा दीपदान करने से हमें पुण्य की प्राप्ति होती है।
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:52 से लेकर 05:44 बजे तक
विजय मुहूर्त: दोपहर 01:56 से लेकर 02:41 बजे तक
गोधूलि मुहूर्त: शाम 5:40 बजे से लेकर 06:05 बजे तक
कार्तिक पूर्णिमा के दिन किए जाने वाले अनुष्ठान:
- प्रातः स्नान:
कार्तिक पूर्णिमा के दिन ब्रह्म मुहूर्त पर स्नान करने का विशेष महत्व है. इस दिन पवित्र नदी में स्नान करना अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता यह भी है कि इस दिन गंगा स्नान करने से साधक के सभी पाप नष्ट हो जाते है और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है. - दीपदान:
कार्तिक पूर्णिमा के दिन संध्या के समय मंदिरों, घरों, नदी किनारे या किसी तीर्थ स्थल पर दीप जलाने की परंपरा है। दीप जलाना इस पर्व का मुख्य अंग है, जिसे ‘देव दीपावली’ कहा जाता है। - व्रत और उपवास:
कई भक्तजन कार्तिक पूर्णिमा के दिन व्रत रखते हैं और भगवान विष्णु तथा शिव की आराधना करते हैं। साधक द्वारा व्रत करने से पापों का नाश और पुण्य की प्राप्ति होती है। - दान और सेवा:
कार्तिक पूर्णिमा के दिन दान करना बेहद ही पुण्यदायी माना जाता है. इस दिन गंगा स्नान के बाद दान करने से साधक को धन-समृद्धि की प्राप्ति होती है. मान्यता यह भी है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन दान करने से हमें कई गुणा फल की प्राप्ति होती है. इस दिन गरीबों को अन्न, वस्त्र, दीपक और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करना सर्वोच्च पुण्यकारी माना गया है।

कार्तिक पूर्णिमा से जुड़ी कथा: शिव द्वारा त्रिपुरासुर का वध
इस दिन त्रिपुरासुर नामक दानव का संहार हुआ, इस कारण कार्तिक पूर्णिमा को “त्रिपुरारी पूर्णिमा” के नाम से भी जाना जाता है — अर्थात् बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक। कार्तिक पूर्णिमा का दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक असुर का संहार किया था और देवताओं को पुनः स्वर्ग में स्थान दिलाया था। इसीलिए इस दिन को त्रिपुरारी पूर्णिमा कहा जाता है।
कार्तिक पूर्णिमा का महत्व:
1) वाराणसी – देव दीपावली
वाराणसी में कार्तिक पूर्णिमा का दिन दिवाली से भी अधिक रोशनी वाला माना जाता है। इस दिन गंगा घाट पर लाखों दीपक जलाकर ‘देव दीपावली’ मनाई जाती है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन पूरा काशी दीपों की सुनहरी आभा से जगमगा उठती है।

(2) ओडिशा – बोइता बंदाना
ओडिशा में इस दिन “बोइता बंदाना” उत्सव मनाया जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन लोग छोटे नाव के रूप में नदी तथा गंगा घाट में दीपक प्रवाहित करते हैं.
(3) तमिलनाडु – कार्तिगै दीपम
दक्षिण भारत में यह पर्व “कार्तिगै दीपम” के रूप में मनाया जाता है। तिरुवन्नामलाई में पर्वत के शिखर पर विशाल दीप जलाया जाता है, जो भगवान शिव के अनंत ज्योति स्वरूप का प्रतीक है।
“दीप जलाओ, मन को उज्जवल बनाओ,
कार्तिक पूर्णिमा का प्रकाश, हर हृदय में फैलाओ।”
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